Tuesday, 10 February 2015

कमरे में बैठी थी दुल्हन, सज धज के शरमाई हुई, एक अजनबी से बहुत सी उम्मीदे थी, लगायी हुई... आईने में खुद को देखती रहती, मन ही मन खुश होती, दुनिया की सारी खुशिया थी जैसे, उसके दर पे आई हुई... लाल जोड़े में बैठी, हाथो में चुडिया पहने, चेहरे पे मुस्कान, आँखे थी काजल से सजाई हुई... फिर कुछ देर बाद आवाज़ आई, "ये शादी नहीं हो सकती", ये सुनकर, दुल्हन का दिल टूटा, और थी वो घबराई हुई... लड़के के माँ-बाप ने कहा, "दहेज़ और चाहिए", लड़की वालो ने सोचा, अब बात इज़्ज़त पे आई हुई... सब कुछ बेच-बाच कर, अपनी बिटिया की शादी की, माँ-बाप का दिल था भरा, आँखे थी भर आई हुई... बेटी पराये घर को अपना घर समझे, दिल से सेवा करे, पर हर कदम पर तमनाओ को, रहे हमेशा दबई हुई... दुल्हन का मोल... एक सोफा, एक कार, एक फ्रिज, एक बिस्तर, ये कैसी शादी, जिसमे दुल्हन की बोली थी, पैसो से लगायी हुई... हर बात पर बहु को ताने, "क्या दिया तेरे माँ-बाप ने ??", दुल्हन के ख्वाब, उमीदे, खुशियाँ, सब पल भर में, परायी हुई... दुल्हन रोती-तड़पती, पर अपने माँ-बाप से कुछ ना कहती, इस हाल में क्या उसके, पति को भी कोई शर्म ना थी आई हुई ??? मैं पूछता हूँ सबसे, क्या ये शादी है, या सौदेबाज़ी... जहा प्यार होना चाहिए, वहा हिसाब-किताब की बातें, आखिर किसने यह दहेज़ की आग, लगाई हुई ?? आखिर किसने यह दहेज़ की आग, लगाई हुई ????


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